बरसाना में एक कस्बे की एक पहाड़ी पर बना है राधा रानी का महल

बरसाना के इस राधा रानी मंदिर का प्राचीन नाम वृषभानुपुर है जो करीब 343 साल पुराना है

बरसाना मथुरा जिले की गोवर्धन तहसील व नन्दगाँव ब्लाक में स्थित एक क़स्बा और नगर पंचायत है। कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण की राधा बरसाना की ही रहने वाली थीं। क़स्बे के मध्य श्री राधा की जन्मस्थली माना जाने वाला  श्री राधावल्ल्भ मन्दिर स्थित है। राधा का जिक्र पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी मिलता है। पद्म पुराण के अनुसार राधा वृषभानु नामक गोप की पुत्री थीं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राधा कृष्ण का बाल विवाह हुआ। कुछ विद्वान मानते हैं कि राधाजी का जन्म यमुना के निकट बसे स्थित रावल ग्राम में हुआ था और बाद में उनके पिता बरसाना में बस गए। इस मान्यता के अनुसार नन्दबाबा एवं वृषभानु का आपस में घनिष्ठ प्रेम था। कंस के द्वारा भेजे गये असुरों के उपद्रवों के कारण जब नन्दराज अपने परिवार, समस्त गोपों एवं गौधन के साथ गोकुल-महावन छोड़ कर नन्दगाँव में निवास करने लगे, तो वृषभानु भी अपने परिवार सहित उनके पीछे-पीछे U गाँव को त्याग कर चले आये और नन्दगाँव के पास बरसाना में आकर निवास करने लगे। लेकिन लोग अधिकतर मानते हैं कि उनका जन्म बरसाना में हुआ था। राधारानी का प्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है। बरसाना में राधा जी को 'लाड़लीजी' कहा जाता है।



बरसाना धाम के दो पर्वत:-
कहानी के अनुसार ब्रज में निवास करने के लिये स्वयं ब्रह्मा भी आतुर रहते थे एवं श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का आनन्द लेना चाहते थे। अतः उन्होंने सतयुग के अंत में विष्णु से प्रार्थना की कि आप जब ब्रज मण्डल में अपनी स्वरूपा श्री राधा जी एवं अन्य गोपियों के साथ दिव्य रास-लीलायें करें तो मुझे भी उन लीलाओं का साक्षी बनायें एवं अपनी वर्षा ऋतु की लीलाओं को मेरे शरीर पर संपन्न कर मुझे कृतार्थ करें। ब्रह्मा की इस प्रार्थना को सुनकर भगवान विष्णु ने कहा -"हे ब्रह्मा! आप ब्रज में जाकर वृषभानुपुर में पर्वत रूप धारण कीजिये। पर्वत होने से वह स्थान वर्षा ऋतु में जलादि से सुरक्षित रहेगा, उस पर्वतरूप तुम्हारे शरीर पर मैं ब्रज गोपिकाओं के साथ अनेक लीलाएं करुंगा और तुम उन्हें प्रत्यक्ष देख सकोगे। यहाँ के पर्वतों पर श्री राधा-कृष्ण जी ने अनेक लीलाएँ की हैं। अतएव बरसाना में ब्रह्मा पर्वत रूप में विराजमान हैं। पद्म पुराण के अनुसार यहाँ विष्णु और ब्रह्मा नाम के दो पर्वत आमने सामने विद्यमान हैं। दाहिनी ओर ब्रह्म पर्वत और बायीं विष्णु पर्वत है।


लट्ठमार होली:-
बरसाना गाँव लट्ठमार होली के लिये सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है जिसे देखने के लिये हजारों भक्त एकत्र होते हैं। बसंत पंचमी से बरसाना होली के रंग में सरोबार हो जाता है। यहां के घर-घर में होली का उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।[3] टेसू (पलाश) के फूल तोड़कर और उन्हें सुखा कर रंग और गुलाल तैयार किया जाता है। गोस्वामी समाज के लोग गाते हुए कहते हैं- "नन्दगाँव को पांडे बरसाने आयो रे।" (बरसाना और नंदगाव के बीच 4 मील का फासला है।) शाम को 7 बजे चौपाई निकाली जाती है जो लाड़ली मन्दिर होते हुए सुदामा चौक रंगीली गली होते हुए वापस मन्दिर आ जाती है। सुबह 7 बजे बाहर से आने वाले कीर्तन मंडल कीर्तन करते हुए गहवर वन की परिक्रमा करते हैं। बारहसिंघा की खाल से बनी ढ़ाल को लिए पीली पोखर पहुंचते हैं। बरसानावासी उन्हें रुपये और नारियल भेंट करते हैं, फिर नन्दगाँव के हुरियारे भांग-ठंडाई छानकर मद-मस्त होकर पहुंचते हैं। राधा-कृष्ण की झांकी के सामने समाज गायन करते हैं।

राधारानी मंदिर:-
लाड़ली जी के मंदिर में राधाष्टमी का त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह त्यौहार भद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को आयोजित किया जाता है। राधाष्टमी के उत्सव में राधाजी के महल को काफी दिन पहले से सजाया जाता है। राधाजी को लड्डूओं का भोग लगाया जाता है और उस भोग को मोर को खिला दिया जाता है जिन्हें राधा कृष्ण का स्वरूप माना जाता है। राधा रानी मंदिर में राधा जी का जन्मदिवस राधा अष्टमी मनाने के अलावा कृष्ण जन्माष्टमी, गोवर्धन-पूजन, गोप अष्टमी और होली जैसे पर्व भी बहुत धूम-धाम से मनाए जाते हैं। इन त्योहारों में मंदिर को मुख्य रूप से सजाया जाता है, प्रतिमाओं का श्रृंगार विशेष रूप से होता है, मंदिर में सजावटी रोशनी की जाती है और सर्वत्र सुगन्धित फूलों से झांकियां बना कर विग्रह का श्रृंगार किया जाता है। राधा को छप्पन भोग भी लगाए जाते हैं। राधाष्टमी अष्टमी से चतुर्दशी तक यहां मेले का आयोजन भी होता है। होली के त्योहार में भी इस मंदिर की विशेष झलक देखने को मिलती है। होली के अवसर पर राधारानी मंदिर से झांकी निकाली जाती है। साथ ही चौपाई भी निकलती है इस सबके साथ-साथ भक्त लोग गाते बजाते हुए होली के गीत गाते हुए चलते हैं। यह चौपाई बरसाना की गलियों से गुजरते हुए रंगों की बौछार करती निकलती है। श्रद्धालुगण मंदिर में भी परस्पर रंग अबीर फेंक कर होली का उत्सव मानाते हैं और कई भक्त मंदिर के सेवादार लोगों पर केसर-जल, इत्र और गुलाबजल की बौछार करते हैं।


धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर की महत्ता

हिन्दू धर्म एक प्राचीन और विशाल धर्म है जो भारतीय सभ्यता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस धर्म का इतिहास और धार्मिक विचार अनगिनत वर्षों का है, जिसमें कई प्रकार की संप्रदायिकताओं और धार्मिक साधनाओं का समावेश है। हिन्दू धर्म की संस्कृति और तत्व विश्व के किसी भी धर्म या धार्मिक सिद्धांत के साथ मिलान नहीं करती है। इसकी सबसे विशेषता भारतीय उपमहाद्वीप के अलग-अलग क्षेत्रों में विविधता और अनेकता को समेटने की क्षमता है।

अयोध्या: धर्म और सांस्कृतिक महत्व: अयोध्या भारतीय इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यह स्थल प्राचीन रामायण काल में प्रख्यात राजधानी था, जहां प्रभु राम ने अपने जीवन के अधिकांश समय व्यतीत किया था। अयोध्या का नाम भगवान राम और भक्त रामायण के द्वारा जाना जाता है, और यहां कई महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल हैं जो हिन्दू धर्म के लिए प्रमुख माने जाते हैं।

Efforts for Social Reform and Charity in Parsi Indian societys

Through their Charity and social reform the Parsi community, though small in numbers, has forever impacted the society’s financial, cultural and social life. The modern India is shaped by these people through gender equality, education and healthcare initiatives as well as community development. A more detailed examination of the history, influence and continued relevance of Parsi based philanthropical and social reforms aimed at changing Indian society is provided here.

Historical Context: The Parsis migrated from Persia (now Iran) to India a thousand years ago. They are Zoroastrians who have been involved in a long tradition of charity work and public service grounded on religious beliefs and customs. Despite being a minority group, that did not prevent them from making an impact on various aspects of Indian living dependent upon their Wealth, education or social standing thus elevate the less advantaged in order to achieve justice.

Ancient Charity Efforts: On their arrival to India, the Parsi settlers fight with the need for education, health care and social welfare while at their new home. In reaction to this situation, they formed several charities as well as educational institutions and hospitals to cater for the community’s needs and have a significant impact on society at large.

Among the earliest cases of Parsi philanthropy was in the seventeenth century when the Parsi Panchyat Funds were constituted. These funds offered financial support to needy members within the community for varying purposes such as education, marriage and illness.

The Amazing Kshatriya Warriors Heritage A Study of Indias Legendary Heroes

As is arguably the case in the Indian epics as, for instance, the Mahabharata and the Ramayana, the primordial exploits of the Kshatriya warrior class have never ceased to amaze the world. Unlike any other text, an ancient text provides a repository of myth and legend that not only delves into the ethos and character of Kshatriya warriors but also provides a perspective into their martial prowess. By their exemplary conduct of values and unforeseen behavior of morality, upholding of righteousness that is dharma have left their footprints deeply rooted and evolved into Indian culture. This write up begins voyage of introduction to the exciting stories and causing effect of Keltrons of Indian antiquity.The Origin of Kshatriya Warriors:The Origin of Kshatriya Warriors:The designation of Kshatriya, in Sanskrit is from the root of Kshatra, which means power or dominion. As stipulated in varna, the Kshatriyas were entrusted with the responsibility of protecting the society. Additionally, the collective mission was to oversee dharma. Once the Hindu scriptures were produced, diversification of caste structure happened and the Kshatriyas were the offspring of creator deity, which symbolized their moral duty to be careful with power and maintain justice.Legendary Kshatriya Warriors in the Mahabharata:Legendary Kshatriya Warriors in the Mahabharata:The Mahabharata, which is a part of the world sublime poetry, has all the fights of the valorous warriors belonging to the Kshatriya clan, who have been showing their power at the Kurukshetra War. Right in the center of this epic is the past of the Pandavas and the Kauravas, the two branches that are into a power struggle. These youths are also cousins. The way of life that includes the values such as courage (Arjuna), disciply (Bhishma), miracles in warfare (Drona) and respecting of rules and regulations (Karna) is well admired and respected. 

Bhagavad Gita, Chapter 2, Verse 20

"Na jāyate mriyate vā kadāchin
Nāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ
Ajo nityaḥ śhāśhvato ’yaṁ purāṇo
Na hanyate hanyamāne śharīre"

Translation in English:

"The soul is never born and never dies; nor does it ever become, having once existed, it will never cease to be. The soul is unborn, eternal, ever-existing, and primeval. It is not slain when the body is slain."

Meaning in Hindi:

"आत्मा कभी न जन्मता है और न मरता है; न वह कभी होता है और न कभी नहीं होता है। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत, पुराणा है। शरीर की हत्या होने पर भी वह नष्ट नहीं होता।"